सुग्रीव मैत्री
कथाएँ एवं घटनाएँ
अन्य नाम: राम-सुग्रीव मित्रता, हनुमान मिलन
सीता को खोजते हुए श्रीराम और लक्ष्मण पंपा सरोवर के निकट ऋष्यमूक पर्वत पर पहुँचे, जहाँ वानरराज सुग्रीव अपने बड़े भाई वाली के भय से छिपकर रहता था।
सुग्रीव ने हनुमान को ब्राह्मण-वेश में राम के पास भेजा। हनुमान राम और लक्ष्मण को अपने कंधे पर बिठाकर सुग्रीव के पास लाए।
राम और सुग्रीव ने अग्नि को साक्षी मानकर मैत्री की। राम ने सुग्रीव को वाली से उत्पन्न भय दूर करने और वाली-वध का वचन दिया, तथा सुग्रीव ने सीता की खोज में वानर-सहायता देने का वचन दिया।
इस मैत्री के बल पर आगे वाली-वध, सीता की खोज, समुद्र-सेतु और लंका-विजय संभव हुआ। यह प्रसंग बताता है कि धर्म-मार्ग में नि:स्वार्थ मित्रता कैसे महान कार्य सिद्ध करती है।
प्रसिद्ध कथन
राम ने सुग्रीव से कहा — 'तुम्हारे शत्रु मेरे शत्रु हैं, तुम्हारे सुख-दुःख मेरे ही हैं।' (भावानुवाद)
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स्रोत: वाल्मीकि रामायण – किष्किन्धाकाण्ड