जटायु मोक्ष
कथाएँ एवं घटनाएँ
अन्य नाम: जटायु वध, जटायु की मृत्यु
सीता को हरकर ले जाते रावण का मार्ग दशरथ के मित्र, गृध्रराज जटायु ने रोका। वृद्ध होने पर भी जटायु ने रावण को ललकारा और उससे भीषण युद्ध किया।
जटायु ने रावण का रथ, ध्वज और धनुष तोड़ दिया और उसका सारथि भी मार गिराया। अंत में रावण ने खड्ग से जटायु के पंख और टाँगें काट दीं। घायल जटायु पृथ्वी पर गिर पड़े।
राम सीता को खोजते हुए उसी वन में पहुँचे, जहाँ मरणासन्न जटायु पड़े थे। जटायु ने राम को बताया कि रावण सीता को लेकर दक्षिण दिशा की ओर गया है।
अपने प्रिय भक्त की दशा देखकर राम अत्यंत दुःखी हुए। जटायु ने राम के हाथों प्राण त्याग किए, और राम ने उसे पिता के समान अंतिम संस्कार दिया। इसी से जटायु को मोक्ष की प्राप्ति मानी जाती है। यह प्रसंग शरण और भक्ति का सजीव उदाहरण है।
प्रसिद्ध कथन
जटायु ने राम से कहा — 'हे रघुनंदन, रावण सीता को लेकर दक्षिण दिशा में गया है।' (भावानुवाद)
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स्रोत: वाल्मीकि रामायण – अरण्यकाण्ड