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चीरहरण

कथाएँ एवं घटनाएँ

अन्य नाम: द्रौपदी चीरहरण, द्यूत सभा का अपमान

द्यूतअपमानद्रौपदीकृष्ण

युधिष्ठिर ने द्यूत (जुए) में अपना राज्य, धन, भाई, स्वयं और अंत में द्रौपदी तक हार दिया। हारी हुई द्रौपदी को दुशासन ने बालों से खींचकर कौरवों की सभा में लाकर खड़ा किया।

सभा में उपस्थित भीष्म, द्रोण, कृपाचार्य, विदुर आदि महारथियों से द्रौपदी ने न्याय की प्रार्थना की, पर दुर्योधन और कर्ण के उकसाने पर कोई उसकी रक्षा नहीं कर सका। दुशासन ने सभा के सामने उसका वस्त्र खींचना शुरू किया।

द्रौपदी ने हाथ जोड़कर भगवान श्रीकृष्ण को पुकारा। तब उसका चीर अक्षय हो गया — दुशासन जितना खींचता, वस्त्र उतना ही बढ़ता गया और अंत में वह थककर हार गया। भीम ने इस अपमान का बदला लेने की प्रतिज्ञा की।

चीरहरण महाभारत का सबसे निर्णायक प्रसंग माना जाता है और इसे युद्ध का मुख्य नैतिक कारण कहा जाता है। इसी सभा में भीम, अर्जुन, सहदेव आदि ने दुशासन और दुर्योधन के वध तथा कौरव-वंश के नाश की प्रतिज्ञाएँ लीं।

प्रसिद्ध कथन

द्रौपदी की सभा में पुकार — 'हे गोविंद! हे माधव! हे कृष्ण! मेरी रक्षा करो, सभा में धर्म की स्थापना करो।' (भावानुवाद)
भीम की प्रतिज्ञा — 'इस अपमान का बदला मैं दुशासन की छाती फाड़कर तथा उसका रक्त पीकर लूँगा।' (भावानुवाद)

संबंधित

द्रौपदीदुःशासनदुर्योधनश्रीकृष्णविदुरकर्ण

स्रोत: महाभारत – सभा पर्व