राहु
वेद एवं पुराण
अन्य नाम: राहु, स्वर्भानु, उत्तर चंद्र-पात
राहु नवग्रहों में एक छाया-ग्रह हैं और चंद्रमा के उत्तर पात (आसंधि) के स्वामी माने जाते हैं। वे सूर्य या चंद्र को ग्रसने वाले देवता के रूप में जाने जाते हैं, इसीलिए ग्रहण को राहु से जोड़ा जाता है।
समुद्र मंथन के समय असुर स्वर्भानु ने छल से देवताओं के बीच बैठकर अमृत पी लिया। सूर्य और चंद्र ने उसे पहचान लिया; तब मोहिनी रूपधारी विष्णु ने सुदर्शन चक्र से उसका सिर काट दिया। अमृत पीने के कारण उसका सिर (राहु) और धड़ (केतु) दोनों जीवित रह गए।
सिर कटने के बाद भी अमर राहु सूर्य-चंद्र से शत्रुता रखते हैं; ग्रहण के समय उन्हें सूर्य या चंद्र को ग्रसते हुए माना जाता है। परंपरा में उनका वाहन सिंह बताया जाता है, यद्यपि कुछ ग्रंथों में भिन्न वर्णन मिलता है।
राहु सदा वक्री (प्रतिगामी) रहते हैं और जिस राशि-भाव में स्थित हों उसे प्रबल कर देते हैं।
नाते-रिश्ते
- अंश: स्वर्भानु का सिर
- सहोदर: केतु
- शत्रु: सूर्य
- शत्रु: चंद्र
- वाहन: सिंह
संबंधित
स्रोत: समुद्र मंथन प्रसंग, विष्णु पुराण, नवग्रह प्रसंग