केतु
वेद एवं पुराण
अन्य नाम: केतु, दक्षिण चंद्र-पात
केतु नवग्रहों में एक छाया-ग्रह हैं और चंद्रमा के दक्षिण पात (आसंधि) के स्वामी माने जाते हैं। वे स्वर्भानु के उस धड़ से उत्पन्न हुए जो अमृत पीने के बाद सिर कटने पर भी जीवित रहा।
परंपरा में केतु को सर्प की पूँछ के रूप में माना जाता है। वे सदा वक्री रहते हैं और वैराग्य, अध्यात्म, पूर्वजन्म के कर्म तथा मोक्ष से जुड़े माने जाते हैं।
राहु की तरह केतु भी ग्रहण से जुड़े हैं, पर इनका स्वभाव अधिक आध्यात्मिक और त्यागपूर्ण माना जाता है। परंपरा में उनका वाहन गिद्ध या गरुड़ बताया जाता है।
ज्योतिष में केतु को किसी को आकस्मिक उन्नति या गहन आध्यात्मिक मोड़ देने वाला ग्रह माना जाता है।
नाते-रिश्ते
- अंश: स्वर्भानु का धड़
- सहोदर: राहु
- वाहन: गरुड़
पूर्वजन्म एवं प्रारब्ध
पूर्वजन्म के कर्म और मोक्ष से जुड़ा ग्रह
संबंधित
स्रोत: समुद्र मंथन प्रसंग, विष्णु पुराण, नवग्रह प्रसंग