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लंकाकांड

ग्रंथ

अन्य नाम: लंका कांड, युद्धकांड, युद्ध कांड

रचयिता / कर्ता: वाल्मीकि

रामायणकांडयुद्धवाल्मीकि

लंकाकांड (युद्धकांड) वाल्मीकि रामायण का छठा कांड है। इसमें विभीषण की शरणागति, समुद्र पर सेतु-निर्माण और लंका पहुँचकर श्रीराम की सेना का शिविर लगाना वर्णित है। युद्ध से पूर्व अगस्त्य मुनि ने श्रीराम को आदित्य-हृदय स्तोत्र सिखाया।

मुख्य विषय राम-रावण का महायुद्ध है — अंगद का दूत-कार्य, मेघनाद का पराक्रम और वध, कुंभकरण का वध, लक्ष्मण पर शक्ति-प्रहार और संजीवनी-लाना, तथा अंत में रावण-वध।

इसी कांड में रावण-वध के बाद विभीषण का लंका में राज्याभिषेक, सीता की अग्नि-परीक्षा, पुष्पक-विमान से अयोध्या-वापसी और श्रीराम का राज्याभिषेक वर्णित है।

महात्मा: यह कांड धर्म की अधर्म पर विजय का प्रतीक है और भक्ति तथा शौर्य की शिक्षा देता है।

प्रसिद्ध कथन

ततो युद्धपरिश्रान्तं समरे चिन्तया स्थितम्। रावणं चाग्रतो दृष्ट्वा युद्धाय समुपस्थितम्॥ (आदित्य-हृदय का प्रारंभ, लंकाकांड)

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स्रोत: वाल्मीकि रामायण, लंकाकांड