रावण
रामायण एवं रामचरितमानस
अन्य नाम: दशानन, लंकेश, दशकंधर, पुलस्त्य-पौत्र
रावण लंका का राजा था; वह ऋषि विश्रवा और कैकसी का पुत्र, पुलस्त्य ऋषि का पौत्र तथा कुंभकर्ण, विभीषण और शूर्पणखा का भाई था। उसके दस मुख थे, इसलिए 'दशानन' कहलाया। उसकी पत्नी मंदोदरी और पुत्र मेघनाद था।
वह महापंडित, वेद-वेदांग का ज्ञाता, वीणा-वादक तथा शिव का परम भक्त था; 'शिव तांडव स्तोत्र' की रचना उसी से जुड़ी है। तपस्या से उसने ब्रह्मा से वरदान प्राप्त किए, जिसके बल पर उसने तीनों लोकों में आतंक फैलाया।
अरण्यकाण्ड में शूर्पणखा के अपमान का बदला लेने हेतु उसने मारीच के सहयोग से स्वर्ण-मृग का छल किया और सीता का हरण किया। युद्धकाण्ड में कुंभकर्ण, मेघनाद आदि के वध के बाद अंततः राम के बाण से उसका अंत हुआ।
वे विद्वत्ता और दुर्गुण — दोनों के विरोधाभासी संगम हैं; अहंकार, काम और अत्याचार ने उनके ज्ञान को निष्फल कर दिया। परंपरा में उन्हें 'ज्ञानी पर अधर्मी' का उदाहरण माना जाता है।
नाते-रिश्ते
- पिता: विश्रवा
- माता: कैकसी
- पत्नी: मंदोदरी
- पुत्र: मेघनाद
- भाई: कुंभकर्ण, विभीषण
पूर्वजन्म एवं प्रारब्ध
पूर्वजन्म में विष्णु-द्वारपाल जय-विजय में से एक (जय)
प्रसिद्ध कथन
संबंधित
स्रोत: वाल्मीकि रामायण – अरण्यकाण्ड, युद्धकाण्ड; रामचरितमानस – लंकाकाण्ड