गंगावतरण
कथाएँ एवं घटनाएँ
अन्य नाम: गंगा का अवतरण, भगीरथ प्रयत्न
राजा सगर के अश्वमेध यज्ञ का घोड़ा कपिल मुनि के आश्रम में पहुँचा। सगर के साठ हजार पुत्रों ने मुनि को चोर समझकर अपमानित किया, जिससे कपिल मुनि की दृष्टि से वे सब भस्म हो गए।
उनके उद्धार का कोई उपाय नहीं था, क्योंकि उनकी भस्म पर गंगा-जल ही मोक्ष दे सकता था। राजा भगीरथ ने कठोर तपस्या करके ब्रह्मा को प्रसन्न किया और गंगा को पृथ्वी पर उतारने की अनुमति माँगी।
भगीरथ की तपस्या से प्रसन्न ब्रह्मा ने गंगा को पृथ्वी पर भेजा, परंतु उनके वेग को सहने के लिए शिव ने गंगा को अपनी जटाओं में धारण किया और फिर धीरे-धीरे प्रवाहित किया।
भगीरथ गंगा को लेकर आगे चले और सगर-पुत्रों की भस्म पर गंगा-जल बहने से उनका उद्धार हुआ। गंगा के इस अवतरण-स्थान को गंगोत्री और आगे हरिद्वार कहा जाता है। भगीरथ के प्रयत्न के कारण ही गंगा 'भागीरथी' कहलातीं हैं।
प्रसिद्ध कथन
संबंधित
स्रोत: वाल्मीकि रामायण – बालकाण्ड