गंगोत्री
तीर्थ एवं स्थान
अन्य नाम: गंगोत्री धाम
गंगोत्री उत्तराखंड के उत्तरकाशी ज़िले में, गढ़वाल हिमालय की ग्रेटर हिमालय श्रेणी में, समुद्रतल से लगभग 3,100 मीटर की ऊँचाई पर भागीरथी नदी के तट पर बसा है। यह उत्तरकाशी से लगभग 99 किमी आगे है। गंगा का वास्तविक उद्गम 'गौमुख' है — गंगोत्री से करीब 19 किमी दूर गंगोत्री हिमनद का मुख, जो गाय के मुख जैसा दिखता है। भागीरथी आगे देवप्रयाग में अलकनंदा से मिलकर 'गंगा' कहलाती है।
गंगोत्री को छोटे चार धाम की यात्रा में गिना जाता है और यह गंगा देवी का निवास-स्थल माना जाता है। मंदिर मूलतः गोरखा सेनापति अमर सिंह थापा ने बनवाया था, जिसका बाद में जयपुर के महाराजा ने जीर्णोद्धार कराया। मंदिर के समीप 'भागीरथ शिला' है, जहाँ राजा भागीरथ ने शिव की तपस्या की थी।
कथा के अनुसार सगर के पुत्रों के उद्धार के लिए राजा भागीरथ ने घोर तप किया और गंगा को पृथ्वी पर लाने का वरदान पाया। गंगा के प्रचंड वेग को शिव ने अपनी जटाओं में धारण किया, और वहीं से गंगा पृथ्वी पर उतरी। इसी स्थान को गंगा के पृथ्वी पर अवतरण का स्थल माना जाता है। मान्यता है कि गंगोत्री का जल शिवलिंग पर चढ़ाने से शिव के कंठ को शांति मिलती है।
मंदिर दिवाली के दिन बंद होता है और अक्षय तृतीया पर खुलता है; शीतकाल में गंगा की मूर्ति हर्षिल के पास मुखबा गाँव में रखी जाती है। पूजा का अधिकार सेमवाल परिवार के पुजारियों के पास है। यहाँ पितृ-कार्य और अस्थि-विसर्जन का विशेष महत्व है।
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स्रोत: स्कन्द पुराण; वाल्मीकि रामायण (बालकाण्ड)