विश्वकर्मा
वेद एवं पुराण
अन्य नाम: देवशिल्पी, मय, त्वष्टा, शिल्पकार, वास्तुकार
विश्वकर्मा देवताओं के शिल्पी और वास्तुकार हैं — ब्रह्मांड के प्रधान अभियंता। वे देवताओं के विमान, नगर, महल, रथ और दिव्य अस्त्र बनाते हैं। ऋग्वेद में उन्हें 'विश्वकर्मा' के रूप में एक दिव्य शिल्पी-देवता कहा गया है, जिन्होंने समस्त लोकों की रचना की। पुराणों में उनका व्यक्तित्व और भी विस्तृत हो गया।
उनका वाहन हंस (या हाथी) है और हाथों में मापक-यंत्र (गुनिया), कमंडल आदि शिल्प-उपकरण। माना जाता है कि उनकी पुत्री संज्ञा का विवाह सूर्य से हुआ। उन्हें 'त्वष्टा' और 'मय' (दानव-शिल्पी से भिन्न) जैसे नामों से भी जोड़ा जाता है।
उनके निर्माणों में — इंद्र की राजधानी अमरावती, कुबेर की लंका (जो बाद में रावण को मिली), द्वारका, इंद्रप्रस्थ (हस्तिनापुर के पांडव-नगर), इंद्र का वज्र, शिव का त्रिशूल और देवताओं के विमान आते हैं। कहा जाता है कि उन्होंने देवताओं के लिए सभा-भवन तथा यज्ञ-मंडप भी बनाए।
विश्वकर्मा की पूजा विशेषतः शिल्पकारों, बढ़इयों और इंजीनियरों द्वारा की जाती है; विश्वकर्मा प्रकाश (सामान्यतः 17 सितंबर) उनका प्रमुख पर्व है। उनकी महिमा ऋग्वेद के विश्वकर्मा सूक्त, विष्णु पुराण और महाभारत में मिलती है।
नाते-रिश्ते
- पुत्री: संज्ञा
- वाहन: हंस
प्रसिद्ध कथन
संबंधित
स्रोत: ऋग्वेद (विश्वकर्मा सूक्त); विष्णु पुराण