सीता का भूमि प्रवेश
कथाएँ एवं घटनाएँ
अन्य नाम: सीता का भूमि में समाना, भूमि प्रवेश
लव-कुश और सीता के साथ पुनर्मिलन के बाद राम ने सीता को दरबार में बुलाया, जहाँ पुनः उनकी शुद्धि का प्रमाण माँगा गया। सीता ने कहा कि वे इस जीवन से थक चुकी हैं।
सीता ने अपनी माता पृथ्वी का स्मरण किया और कहा कि यदि उन्होंने कभी राम के अतिरिक्त किसी का चिंतन न किया हो, तो धरती उन्हें अपने में स्थान दे।
तब पृथ्वी फट गई और उसमें से एक दिव्य सिंहासन प्रकट हुआ, जिस पर बैठी माता पृथ्वी ने सीता को गोद में लेकर धरती के भीतर समा लिया। सभा स्तब्ध रह गई।
राम अत्यंत दुःखी हुए और प्रजा-निंदा को अस्वीकार करने की अपनी असमर्थता पर विषाद व्यक्त किया। यह प्रसंग रामायण की मूल (वाल्मीकि) कथा का दुःखद समापन-भाग माना जाता है।
प्रसिद्ध कथन
सीता ने कहा — 'हे माता पृथ्वी, यदि मैं पवित्र हूँ तो मुझे अपने में स्थान दो।' (भावानुवाद)
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स्रोत: वाल्मीकि रामायण – उत्तरकाण्ड