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गजेन्द्र मोक्ष

कथाएँ एवं घटनाएँ

अन्य नाम: गजेन्द्र की मुक्ति, हाथी और मगर

अष्टम स्कन्धविष्णुगजेन्द्रमोक्ष

पूर्वजन्म में इंद्रद्युम्न नाम के राजा थे, जो अगस्त्य मुनि के शाप से हाथी (गजेन्द्र) बने थे। त्रिकूट पर्वत पर वे सहस्र हाथियों के साथ विचरते थे। एक गंधर्व (हूहू) भी शाप से मगर (ग्राह) बना था।

एक दिन गजेन्द्र जल में स्नान करने गए, तो उस मगर ने उनका पैर पकड़ लिया। सहस्र हाथियों ने मिलकर भी छुड़ाने का प्रयास किया, पर असफल रहे। गजेन्द्र का बल क्षीण होने लगा।

तब गजेन्द्र ने जल से उठाकर भगवान का स्मरण करते हुए एक कमल-पुष्प उन्हें अर्पित किया और अत्यंत व्याकुल होकर पुकारा — 'हे नारायण!'। यह भक्ति की पराकाष्ठा थी।

भगवान विष्णु गरुड़ पर सवार होकर तत्काल प्रकट हुए, अपने चक्र से मगर को काटकर गजेन्द्र को मुक्त कराया, और गजेन्द्र को अपना पार्षद बनाकर उन्हें मोक्ष प्रदान किया। यह प्रसंग श्रीमद्भागवत पुराण के अष्टम स्कन्ध में विस्तार से आता है और सर्वोच्च शरणागति का उदाहरण माना जाता है।

प्रसिद्ध कथन

गजेन्द्र ने पुकारा — 'हे नारायण, हे जगन्नाथ, मेरी रक्षा करो।' (भावानुवाद)

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स्रोत: श्रीमद्भागवत पुराण – अष्टम स्कन्ध