श्रीधर सुबोधिनी
ग्रंथ
अन्य नाम: सुबोधिनी, गीता सुबोधिनी
रचयिता / कर्ता: श्रीधर स्वामी
यह भगवद्गीता पर श्रीधर स्वामी द्वारा रचित भाष्य है, जिसे सुबोधिनी कहा जाता है। श्रीधर स्वामी ने श्रीमद्भागवत पर भी भावार्थदीपिका नामक प्रसिद्ध टीका लिखी।
श्रीधर स्वामी वैष्णव परंपरा के आचार्य थे, जिनका संबंध रुद्र (विष्णुस्वामी) संप्रदाय से माना जाता है। तत्त्व की दृष्टि से वे अद्वैत के निकट थे, पर भक्ति को मोक्ष का प्रमुख साधन मानते थे।
सुबोधिनी सरल और सुबोध शैली में लिखी गई है, जिसके कारण यह गीता की सर्वाधिक लोकप्रिय टीकाओं में से एक बनी। इसका प्रभाव चैतन्य महाप्रभु की गौड़ीय वैष्णव परंपरा तथा अनेक आगामी भाष्यकारों पर पड़ा।
प्रसिद्ध कथन
वन्दे कृष्णार्जुनौ वीरौ नरनारायणावुभौ। (सुबोधिनी का मंगलाचरण)
कर्मण्येवाधिकारस्ते मा फलेषु कदाचन। (भगवद्गीता २.४७)
संबंधित
भगवद्गीतामहाभारत (ग्रंथ)शांकर भाष्य (भगवद्गीता)मधुसूदन गूढार्थदीपिकाज्ञानेश्वरी
स्रोत: सुबोधिनी