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शांकर भाष्य (भगवद्गीता)

ग्रंथ

अन्य नाम: गीता भाष्य, शांकर गीता भाष्य, गीताभाष्य

रचयिता / कर्ता: आदि शंकराचार्य

अद्वैत वेदांतभगवद्गीताभाष्य

यह भगवद्गीता पर आदि शंकराचार्य द्वारा रचित प्रसिद्ध भाष्य है। भगवद्गीता महाभारत के भीष्मपर्व में श्रीकृष्ण और अर्जुन के संवाद के रूप में आती है, और शंकराचार्य ने उसके सात सौ श्लोकों की शब्द-शब्द पर व्याख्या की है।

शंकराचार्य अद्वैत वेदांत संप्रदाय के आद्य आचार्य हैं। इस भाष्य में उन्होंने गीता का मुख्य प्रतिपाद्य ज्ञान और संन्यास माना है; कर्मयोग को उन्होंने ज्ञान की प्राप्ति का साधन कहा है।

भाष्य का दृष्टिकोण विशुद्ध अद्वैत है — ब्रह्म और आत्मा की एकता, माया और अविद्या का निरूपण, तथा अकर्ता-आत्मा का बोध इसके केंद्र में है। यह गीता पर उपलब्ध प्राचीनतम पूर्ण भाष्यों में से एक होने के कारण वेदांत परंपरा का आधार-ग्रंथ माना जाता है।

प्रसिद्ध कथन

न हि ज्ञानेन सदृशं पवित्रमिह विद्यते। (भगवद्गीता ४.३८)
श्रद्धावाँल्लभते ज्ञानं तत्परः संयतेन्द्रियः। (भगवद्गीता ४.३९)

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स्रोत: गीता भाष्य