मधुसूदन गूढार्थदीपिका
ग्रंथ
अन्य नाम: गूढार्थदीपिका, गूढार्थ दीपिका, मधुसूदनी
रचयिता / कर्ता: मधुसूदन सरस्वती
यह भगवद्गीता पर मधुसूदन सरस्वती द्वारा रचित भाष्य है, जिसे गूढार्थदीपिका (गूढ़ अर्थ का प्रकाशक) कहा जाता है।
मधुसूदन सरस्वती सोलहवीं शताब्दी के अद्वैत वेदांत के प्रमुख आचार्य थे और अद्वैतसिद्धि के रचयिता। वे शंकर के अद्वैत के दृढ़ समर्थक थे, पर भक्ति को विशेष महत्व देते थे।
इस भाष्य में उन्होंने ज्ञान, कर्म और भक्ति का समन्वय किया है और शरणागति (पूर्ण समर्पण) को मोक्ष का साधन बताया है। यह अद्वैत और भक्ति को साथ लाने वाला मौलिक भाष्य है, जिसकी गणना गीता की श्रेष्ठ टीकाओं में होती है।
प्रसिद्ध कथन
सर्वधर्मान्परित्यज्य मामेकं शरणं व्रज। (भगवद्गीता १८.६६)
(भावानुवाद) गीता में ज्ञान, कर्म और भक्ति तीनों का समन्वय है, और भक्ति ज्ञान की सहायक है।
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स्रोत: गूढार्थदीपिका