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समुद्र सेतु

कथाएँ एवं घटनाएँ

अन्य नाम: राम सेतु, नल-नील सेतु, सेतुबंध

युद्धकाण्डरामेश्वरमनल-नीलसमुद्र

सीता का समाचार पाकर राम ने वानर-भालू सेना के साथ दक्षिण की ओर प्रस्थान किया और समुद्र-तट पर पहुँचे। समुद्र को पार करना अनिवार्य था।

राम ने तीन दिन तक समुद्र की उपासना की, पर समुद्र ने मार्ग नहीं दिया। तब राम ने धनुष पर बाण रखकर समुद्र को सुखाने का संकल्प किया; भयभीत समुद्र ने प्रकट होकर मार्ग देने और सेतु-निर्माण का उपाय बताया।

विश्वकर्मा-पुत्र नल और नील के नेतृत्व में वानरों ने समुद्र पर पत्थर, वृक्ष और शिलाएँ लाकर सेतु बनाना आरंभ किया। कहा जाता है कि राम के नाम से पत्थर जल पर तैरते थे। पाँच दिनों में सौ योजन लंबा सेतु तैयार हुआ।

इस सेतु से राम की समस्त सेना लंका पहुँची। यह स्थान आज रामेश्वरम के रूप में प्रसिद्ध है, जहाँ राम ने शिवलिंग की स्थापना की थी। सेतु-निर्माण श्रम, एकता और श्रद्धा का प्रतीक माना जाता है।

प्रसिद्ध कथन

राम ने समुद्र से कहा — 'मुझे मार्ग दो, अन्यथा मैं तुम्हें सुखा दूँगा।' (भावानुवाद)

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श्रीरामहनुमानसुग्रीवनलनीलरामेश्वरम

स्रोत: वाल्मीकि रामायण – युद्धकाण्ड