शास्त्रज्ञशास्त्रों के ग्रंथ, पात्र, कथाएँ, स्थान और शब्द — एक जगह

प्रियव्रत

कथाएँ एवं घटनाएँ

प्रियव्रत स्वायम्भुव मनु के ज्येष्ठ पुत्र और ध्रुव के भाई थे। आरम्भ में वे आत्मलीन और विरक्त थे, पर ब्रह्मा और नारद के उपदेश से उन्होंने गृहस्थ-धर्म स्वीकार करके विश्वकर्मा की पुत्री बर्हिष्मती से विवाह किया।

यह कथा श्रीमद्भागवत पुराण के पंचम स्कन्ध में वर्णित है। उन्होंने ग्यारह अर्बुद वर्षों तक पृथ्वी का धर्मपूर्वक शासन किया। एक बार यह देखकर कि सूर्य पृथ्वी के एक ही आधे भाग को प्रकाशित करते हैं, उन्होंने रात्रि को भी दिन बनाने का संकल्प किया।

मुख्य पात्र प्रियव्रत और उनके पुत्र हैं। भगवान की उपासना से प्राप्त तेज से युक्त होकर वे सूर्य के समान रथ पर चढ़े और उसके पीछे-पीछे पृथ्वी की सात परिक्रमाएँ कीं; उनके रथ के पहियों से बनी लीकें सात समुद्र और सात द्वीप बन गईं—जम्बू, प्लक्ष, शाल्मलि, कुश, क्रौंच, शाक और पुष्कर। प्रियव्रत ने अपने सात पुत्रों को इन द्वीपों का राजा बनाया और अंत में सब कुछ त्यागकर पुनः भक्ति-मार्ग पर लौट गए। कथा का महत्व यह है कि राजा अनासक्त होकर भी लोक-कल्याण कर सकता है।

संबंधित

ध्रुव कथानारदविष्णुपुरंजय

स्रोत: श्रीमद्भागवत पुराण – पंचम स्कन्ध