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पुरंजय

कथाएँ एवं घटनाएँ

इक्ष्वाकु-वंश में विकुक्षि (शशाद) के पुत्र पुरंजय हुए, जो वीर और धर्मात्मा राजर्षि थे। त्रेता युग में देवताओं और असुरों में घोर युद्ध हुआ, जिसमें देवता पराजित हो गए।

यह कथा श्रीमद्भागवत पुराण के नवम स्कन्ध तथा विष्णु पुराण में वर्णित है। पराजित देवताओं ने भगवान विष्णु की शरण ली, और विष्णु ने उन्हें पुरंजय की सहायता लेने का परामर्श दिया।

मुख्य पात्र पुरंजय, इंद्र और देवता हैं। पुरंजय ने शर्त रखी कि यदि देवराज इंद्र उनके वाहन बनें तो वे युद्ध करेंगे; विष्णु की प्रेरणा से इंद्र ने वृषभ (बैल) का रूप धारण किया और पुरंजय उसके ककुद (डील) पर बैठकर युद्ध में उतरे। विष्णु के तेज से युक्त होकर उन्होंने असुरों को पराजित किया। पुर जीतने के कारण वे 'पुरंजय', इंद्र को वाहन बनाने से 'इंद्रवाह' और बैल के ककुद पर बैठने से 'ककुत्स्थ' कहलाए। कथा का महत्व यह है कि भगवान की कृपा और धर्म की शक्ति से ही विजय मिलती है।

प्रसिद्ध कथन

(भावानुवाद) यदि देवराज इंद्र मेरे वाहन बनें, तभी मैं आपके शत्रुओं से युद्ध करूँगा।

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स्रोत: श्रीमद्भागवत पुराण – नवम स्कन्ध; विष्णु पुराण – चतुर्थ अंश