याज्ञवल्क्य-मैत्रेयी कथा
कथाएँ एवं घटनाएँ
महर्षि याज्ञवल्क्य ने गृहस्थ-आश्रम त्यागकर वानप्रस्थ लेने का निश्चय किया और अपनी दो पत्नियों—कात्यायनी और मैत्रेयी—के बीच अपनी संपत्ति बाँटने का प्रस्ताव रखा। मैत्रेयी ने पूछा कि क्या धन के माध्यम से उसे अमरत्व प्राप्त हो सकता है।
यह संवाद बृहदारण्यक उपनिषद में वर्णित है। याज्ञवल्क्य ने उत्तर दिया कि धन से मनुष्य अमर नहीं होता; जिस प्रकार धन, गाय, अश्व आदि सब नश्वर हैं, उसी प्रकार उनका उपभोग भी नश्वर है।
मुख्य पात्र याज्ञवल्क्य और मैत्रेयी हैं। याज्ञवल्क्य ने कहा कि पति, पत्नी, पुत्र आदि सब अपने आप में प्रिय नहीं हैं, अपितु उनमें स्थित आत्मा के कारण प्रिय लगते हैं; आत्मा को देखने, सुनने और मनन करने से ही सब कुछ जाना जाता है। मैत्रेयी ने धन का मोह छोड़कर ब्रह्म-ज्ञान को ही अपनाया। कथा का महत्व यह है कि सच्चा सुख और अमरत्व आत्म-ज्ञान में है, भोग-सामग्री में नहीं।
प्रसिद्ध कथन
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स्रोत: बृहदारण्यक उपनिषद – द्वितीय अध्याय