पृषधु
कथाएँ एवं घटनाएँ
वैवस्वत मनु के पुत्रों में एक पृषधु (पृषध्र) थे, जिन्हें गुरु वसिष्ठ ने गायों की रक्षा में नियुक्त किया था। वे रात-रात भर तलवार लेकर गौशाला की पहरा देते थे।
यह कथा श्रीमद्भागवत पुराण के नवम स्कन्ध में वर्णित है। एक वर्षा-भरी अंधेरी रात में एक बाघ गौशाला में घुस आया और एक गाय को पकड़ लिया। गाय की चीत्कार सुनकर पृषधु दौड़े, पर घोर अंधकार में बाघ समझकर उन्होंने अनजाने में गाय का ही सिर काट दिया।
मुख्य पात्र पृषधु और गुरु वसिष्ठ हैं। प्रातःकाल अपनी भूल जानकर वे अत्यंत दुखी हुए; यद्यपि पाप अनजाने में हुआ था, फिर भी कुलपुरोहित वसिष्ठ ने उन्हें शाप दिया कि गो-वध के कारण वे क्षत्रिय न रहकर शूद्र हो जाएँगे। पृषधु ने हाथ जोड़कर शाप स्वीकार किया और ब्रह्मचर्य-व्रत धारण कर भगवान वासुदेव की भक्ति में लीन हो गए; अंत में वन की दावाग्नि में देह त्यागकर परमधाम को प्राप्त हुए। कथा का महत्व यह है कि गुरु-आज्ञा और प्रायश्चित की भावना से मनुष्य उन्नत होता है।
प्रसिद्ध कथन
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स्रोत: श्रीमद्भागवत पुराण – नवम स्कन्ध