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परशुराम संवाद

कथाएँ एवं घटनाएँ

अन्य नाम: परशुराम-लक्ष्मण संवाद, शिव धनुष भंग

सीता स्वयंवरशिव धनुषपरशुरामबालकाण्ड

जनकपुर के राजा जनक ने अपनी पुत्री सीता के स्वयंवर का आयोजन किया। शर्त यह थी कि जो वीर शिवजी का महाधनुष उठाकर उस पर प्रत्यंचा चढ़ा देगा, उसी से सीता का विवाह होगा। अनेक बलशाली राजा आए, पर कोई भी धनुष को हिला तक न सका।

श्रीराम ने गुरु विश्वामित्र की आज्ञा से धनुष उठाया और प्रत्यंचा चढ़ाते ही वह भीषण ध्वनि के साथ दो टुकड़ों में टूट गया। इस गर्जना से सभा स्तब्ध रह गई और सीता ने राम के गले में जयमाला डाली।

धनुष टूटने का समाचार पाकर भृगुवंशी परशुराम अत्यंत क्रुद्ध होकर जनकपुर पहुँचे। उन्होंने राम को ललकारा कि शिव का धनुष तोड़ने वाले को अब उनका धनुष चढ़ाकर दिखाना चाहिए। लक्ष्मण ने परशुराम से तीखे वचन कहे, जिससे वातावरण और तन गया।

राम ने परशुराम का धनुष सहज भाव से लेकर उस पर शर रखा, और परशुराम की समस्त गति-शक्ति राम के शरीर में समा गई। तब राम ने उन्हें अपना विष्णु-स्वरूप दिखाया। तत्वज्ञान पाकर परशुराम शांत हुए और वन की ओर चले गए। यह प्रसंग राम के ईश्वरत्व का प्रमाण तथा राम-सीता विवाह की पूर्व-भूमिका है।

प्रसिद्ध कथन

राम ने परशुराम से कहा — 'हे मुने, आपके धनुष की शक्ति अब मुझमें समा चुकी है।' (भावानुवाद)
परशुराम ने तत्व पहचानकर कहा — 'राम, तुम्हीं मेरे आराध्य हो; मैं तुम्हें पहचान गया।' (भावानुवाद)

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स्रोत: वाल्मीकि रामायण – बालकाण्ड