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नारद-मोह की कथा

कथाएँ एवं घटनाएँ

देवर्षि नारद एक बार वैकुंठ में भगवान विष्णु के पास पहुँचे और अपनी इंद्रिय-विजय तथा माया पर विजय का अभिमान प्रकट किया। भगवान ने मुस्कुराकर कहा कि देवी की माया को कोई पार नहीं कर सकता, और उन्हें इसका प्रत्यक्ष अनुभव कराया।

यह कथा देवी भागवत तथा अन्य ग्रंथों में वर्णित है। भगवान नारद को गरुड़ पर बिठाकर एक सुंदर सरोवर के निकट ले गए और स्नान करने को कहा। जैसे ही नारद जल से बाहर निकले, वे एक रूपवती स्त्री बन गए और अपनी पूर्व स्मृति खो बैठे।

मुख्य पात्र नारद और भगवान विष्णु हैं। उस स्त्री-रूप में नारद का विवाह राजा तालध्वज से हुआ, उन्हें अनेक पुत्र हुए, और कालांतर में जब परिवार का विनाश हुआ तो वे शोक से विह्वल होकर विलाप करने लगीं। तब भगवान ने उन्हें वापस सरोवर पर लाकर उनका पूर्व रूप और स्मृति लौटा दी। कथा का महत्व यह है कि जीव माया से मोहित होकर अपना वास्तविक स्वरूप भूल जाता है; अहंकार के बिना भगवत्कृपा से ही इस मोह का नाश होता है।

प्रसिद्ध कथन

(भावानुवाद) इस माया का बल अत्यंत दुर्ज्ञेय है; बड़े-बड़े योगी भी इसे पार नहीं कर पाते।

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स्रोत: देवी भागवत – षष्ठ स्कन्ध; परंपरा-प्रसिद्ध