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इंद्र का अहंकार

कथाएँ एवं घटनाएँ

वृत्रासुर का वध करके तीनों लोकों में विजय पाने के बाद देवराज इंद्र को अपने वैभव का अहंकार हो गया। उन्होंने दिव्य शिल्पी विश्वकर्मा से एक ऐसा महल बनवाने को कहा जो पहले कभी न बना हो; महल बार-बार बढ़ाया जाता रहा, फिर भी इंद्र का मन नहीं भरा।

यह प्रसंग श्रीमद्भागवत पुराण तथा देवी भागवत आदि ग्रंथों में वर्णित है। भगवान विष्णु ने एक छोटे बालक का रूप धरकर इंद्र के दरबार में प्रवेश किया और पूछा कि इस महल में कितने इंद्र और कितने विश्वकर्मा लगे हुए हैं।

इसी समय चींटियों की एक लंबी पंक्ति वहाँ से जाती दिखी। बालक ने बताया कि इनमें से अनेक चींटियाँ पूर्व जन्मों में इंद्र के पद पर रह चुकी हैं; पुण्य क्षीण होते ही कोई भी पद से गिर सकता है। यह सुनकर इंद्र का अहंकार टूट गया और उसने विनम्रता धारण की। कथा का महत्व यह है कि पद और वैभव अस्थायी हैं; अहंकार ही पतन का मूल कारण है।

प्रसिद्ध कथन

(भावानुवाद) जब तक तुम 'मैं इंद्र हूँ' कहोगे, तब तक गिरोगे; जिस दिन विनम्र होओगे, उसी दिन उठोगे।

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स्रोत: श्रीमद्भागवत पुराण एवं देवी भागवत; परंपरा-प्रसिद्ध