लाक्षागृह दाह
कथाएँ एवं घटनाएँ
अन्य नाम: जतुगृह, वारणावत दाह
धृतराष्ट्र की सहमति से दुर्योधन और शकुनि ने पांडवों को वारणावत भेजकर वहाँ एक ऐसा भवन बनवाया जो भीतर से लाक्षा, घी, तेल आदि ज्वलनशील पदार्थों से बना था। उद्देश्य यह था कि रात्रि में भवन में आग लगाकर पांडवों को कुंती सहित जला दिया जाए।
नीति और धर्म के ज्ञाता विदुर को इस षड्यंत्र का पता था। उन्होंने सीधे कुछ न कहकर अप्रत्यक्ष संकेतों में पांडवों को चेताया और उनके लिए एक भूमिगत मार्ग (सुरंग) खुदवाने का प्रबंध किया।
वारणावत पहुँचकर पांडवों ने यह भेद पहचान लिया। एक रात्रि को भवन में आग लगाई गई; उसी समय कुंती और पाँचों पांडव सुरंग के रास्ते बाहर निकल गए। जलते भवन में एक भीलनी और उसके पाँच पुत्रों की मृत्यु हुई, जिसे लोग पांडवों की मृत्यु मान बैठे।
इस प्रकार पांडव जीवित बचकर वन की ओर चले गए और उनका वनवास-काल आरंभ हुआ। यह घटना कौरव-पांडव के मतभेद की पहली खुली षड्यंत्रकारी कड़ी मानी जाती है।
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स्रोत: महाभारत – आदि पर्व