विदुर
महाभारत
अन्य नाम: क्षत्ता, धृतराष्ट्रानुज, महामंत्री, विदुर
विदुर वेदव्यास और राजकीय दासी परीक्षित्रा के पुत्र थे, इसीलिए वे धृतराष्ट्र और पांडु के भाई थे, परंतु जन्म के कारण उन्हें राजा नहीं बनाया गया। उन्हें ‘क्षत्ता’ भी कहा जाता है, क्योंकि वे राजधर्म और नीति के गहरे ज्ञाता थे। वे हस्तिनापुर के महामंत्री बने और न्याय तथा सत्य के पक्ष में सदा खड़े रहे।
विदुर ने पांडवों को लाक्षागृह के षड्यंत्र से बचाया और द्यूतसभा में सत्यवचन कहकर दुर्योधन तथा धृतराष्ट्र को चेताया। उनका सम्बंध पांडवों से विशेष घनिष्ठ रहा और युद्ध से पूर्व उन्होंने कई बार अनीति की निंदा की। अपने भाषणों में उन्होंने राजनीति, धर्म और आचरण पर गहन उपदेश दिए, जो ‘विदुर-नीति’ के रूप में प्रसिद्ध हैं।
जब दुर्योधन ने कृष्ण को बंदी बनाने की बात कही, तब विदुर ने उसकी तीव्र भर्त्सना की। कुरुक्षेत्र में वे पांडवों के पक्ष में रहे और युद्ध के बाद युधिष्ठिर के राज्याभिषेक में उनकी महत्वपूर्ण भूमिका रही। धर्म, संयम और नीति के कारण वे महाभारत के सर्वाधिक सम्मानित चरित्रों में हैं।
नाते-रिश्ते
- पिता: वेदव्यास, माता: दासी
- भाई: धृतराष्ट्र, पांडु
- भांजे: कौरव-पांडव
पूर्वजन्म एवं प्रारब्ध
पूर्वजन्म में यमराज थे; मांडव्य ऋषि के शाप से विदुर रूप में जन्मे।
प्रसिद्ध कथन
संबंधित
स्रोत: महाभारत – उद्योग पर्व (विदुर-नीति)