द्रौपदी स्वयंवर
कथाएँ एवं घटनाएँ
अन्य नाम: पांचाली स्वयंवर, द्रुपद-पुत्री स्वयंवर
पांडवों के वनवास के समय पांचाल राजा द्रुपद ने अपनी पुत्री द्रौपदी के लिए स्वयंवर का आयोजन किया। स्वयंवर में एक ऊँचे स्तंभ पर घूमते हुए यंत्र में रखी मछली की आँख को नीचे जल में देखते हुए बेधना था — अर्थात देखकर नहीं, बल्कि लक्ष्य के प्रतिबिंब को देखकर बाण चलाना था।
द्रुपद की सभा में अनेक राजा और धनुर्धर एकत्र हुए। दुर्योधन, कर्ण आदि कौरव भी उपस्थित थे, पर कोई शर्त पूरी न कर सका। ब्राह्मण-वेश में आए अर्जुन ने आगे बढ़कर एक ही बाण से मछली की आँख बेध दी और द्रौपदी ने उनके गले में वरमाला डाल दी।
स्वयंवर के बाद द्रुपद और धृष्टद्युम्न ने पांडवों को पहचाना। श्रीकृष्ण के परामर्श से द्रौपदी का विवाह पाँचों पांडवों के साथ हुआ। कुंती के वचन के कारण पाँचों भाइयों ने द्रौपदी को पत्नी के रूप में स्वीकार किया।
यह घटना पांडवों के उत्थान की दिशा बदलने वाली थी। पांचाल नरेश द्रुपद पांडवों के घनिष्ठ सहयोगी बने और द्रौपदी आगे के पूरे महाभारत की केंद्रीय पात्र बनीं।
संबंधित
स्रोत: महाभारत – आदि पर्व