शास्त्रज्ञशास्त्रों के ग्रंथ, पात्र, कथाएँ, स्थान और शब्द — एक जगह

कौषीतकि उपनिषद

ग्रंथ

अन्य नाम: कौषीतकि ब्राह्मण उपनिषद, कौषीतकिब्राह्मण उपनिषद

रचयिता / कर्ता: अपौरुषेय / परंपरा-प्रसिद्ध

उपनिषदवेदांतऋग्वेद

कौषीतकि उपनिषद ऋग्वेद की कौषीतकि शाखा से जुड़ा एक प्राचीन उपनिषद है। यह गद्य में लिखा गया है और इसमें इंद्र तथा राजा प्रतर्दन के बीच हुआ संवाद मुख्य है। इसमें प्राण, प्रज्ञा और आत्मा की एकता तथा मृत्यु के बाद आत्मा की गति का वर्णन मिलता है।

यह उपनिषद ऋग्वेद की कौषीतकि शाखा से संबंधित है, इसीलिए इसका नाम कौषीतकि पड़ा। परंपरा में इसे कौषीतकि ब्राह्मण का अंतिम भाग माना जाता है। इसमें प्राचीन कर्मकांड और आध्यात्मिक ज्ञान दोनों की झलक मिलती है।

इसका मुख्य सिद्धांत यह है कि प्राण ही आत्मा है और प्रज्ञा ही प्राण है; ये दोनों अलग नहीं हैं। इसमें जीवात्मा के शुभ और अशुभ मार्ग तथा पुनर्जन्म का वर्णन भी है। प्रसिद्ध वाक्य है — प्राणोऽस्मि प्रज्ञात्मा, अर्थात् मैं प्राण हूँ और प्रज्ञा-स्वरूप आत्मा हूँ।

प्रसिद्ध कथन

स होवाच — प्राणोऽस्मि प्रज्ञात्मा, तं मामायुरमृतमित्युपास्व।
प्राणो वा आयुः, प्राण उवाचामृतम्।

संबंधित

वायुआत्माब्रह्मऋग्वेदउपनिषदवेदांत

स्रोत: ऋग्वेद