शास्त्रज्ञशास्त्रों के ग्रंथ, पात्र, कथाएँ, स्थान और शब्द — एक जगह

कृपाचार्य

महाभारत

अन्य नाम: कृप, गौतम, शरद्वतपुत्र, कृपीपुत्र

गुरुकुरुअस्त्रविद्याचिरंजीवीकुरुक्षेत्र

कृपाचार्य महर्षि शरद्वान और जानपदी के पुत्र थे; उनकी बहन कृपी से द्रोणाचार्य का विवाह हुआ था। वे कौरवों और पांडवों के प्रथम आचार्य थे, जिन्होंने उन्हें अस्त्र-शस्त्र की आरंभिक शिक्षा दी। शिव की कृपा से उन्हें भी चिरंजीवित्व प्राप्त था।

द्यूतसभा में जब द्रौपदी ने धर्म का प्रश्न पूछा, तब कृपाचार्य भी उपस्थित थे और उन्होंने स्पष्ट उत्तर नहीं दिया। कुरुक्षेत्र युद्ध में वे कौरव-पक्ष से लड़े और द्रोण की मृत्यु के बाद कुछ समय के लिए कौरव-सेना के सेनापति भी बने।

युद्ध के बाद वे अश्वत्थामा के साथ रहे, परंतु अश्वत्थामा द्वारा सोते हुए वीरों की हत्या और ब्रह्मास्त्र-प्रयोग का उन्होंने विरोध किया। वे धर्म-निष्ठ गुरु थे, यद्यपि राजनीतिक विवशताओं में उनके निर्णय कभी-कभी दुर्बल रहे। परीक्षित के राज्याभिषेक के समय वे उपस्थित थे और उन्होंने परीक्षित को शिक्षा दी।

नाते-रिश्ते

  • पिता: शरद्वान (गौतम)
  • बहन: कृपी
  • भांजा: अश्वत्थामा
  • शिष्य: कौरव-पांडव

पूर्वजन्म एवं प्रारब्ध

पूर्वजन्म में रुद्रगणों/मरुतों का अंश थे; घास के गट्ठर से जन्मे।

प्रसिद्ध कथन

अश्वत्थामा को रोकते हुए (भावानुवाद) — “सोते हुए शत्रुओं पर वार करना और ब्रह्मास्त्र चलाना धर्म नहीं है; इससे तेरा ही विनाश होगा।”
द्यूतसभा में (भावानुवाद) — “यह प्रश्न अत्यंत गूढ़ है; मैं इसका निर्णय धर्म-शास्त्र के अनुसार करूँगा।”

संबंधित

द्रोणाचार्यअश्वत्थामाभीष्मकुरुक्षेत्रहस्तिनापुरअर्जुन

स्रोत: महाभारत – आदि पर्व; द्रोण पर्व