कैकेयी
रामायण एवं रामचरितमानस
अन्य नाम: केकयी
कैकेयी केकय देश के राजा अश्वपति की पुत्री और भरत की माता थीं। वे रूप और गुण में श्रेष्ठ तथा दशरथ की अत्यंत प्रिय रानी थीं।
देवासुर संग्राम में रथ-चक्र टूटने पर उन्होंने राजा के प्राण बचाए थे, जिससे प्रसन्न होकर दशरथ ने उन्हें दो वरदान देने का वचन दिया। राज्याभिषेक की तैयारी के समय दासी मंथरा ने उनके मन में ईर्ष्या भर दी।
तब उन्होंने अपने दो वरदान माँगे — भरत को राज्य और राम को चौदह वर्ष का वनवास। राम ने प्रसन्नता से वनवास स्वीकार किया और दशरथ पुत्र-शोक में प्राण त्याग गए।
पश्चात्ताप करते हुए वे सदा राम और भरत की क्षमा की भिक्षुक रहीं; भरत ने उन्हें कठोर वचन कहे। उनका चरित्र ईर्ष्या और पश्चात्ताप के द्वंद्व का प्रतीक है।
नाते-रिश्ते
- पति: दशरथ
- पुत्र: भरत
- पिता: अश्वपति
- दासी: मंथरा
प्रसिद्ध कथन
वरदान माँगते समय: "हे राजन्, मुझे अपने दो वरदान चाहिए — भरत को राज्य और राम को चौदह वर्ष का वनवास।" (भावानुवाद)
राम के वन जाने पर विलाप। (भावानुवाद)
संबंधित
स्रोत: वाल्मीकि रामायण – अयोध्याकाण्ड; रामचरितमानस – अयोध्याकाण्ड