भरत
रामायण एवं रामचरितमानस
अन्य नाम: कैकेयीनंदन, भरतजी
भरत दशरथ तथा कैकेयी के पुत्र थे; उनका विवाह जनक के भाई कुशध्वज की पुत्री मांडवी से हुआ। राज्याभिषेक के समय वे अपने मामा के घर (कैकेय) में थे और माता के षड्यंत्र से अनभिज्ञ थे।
राज्याभिषेक का समाचार सुनकर वे अयोध्या लौटे और माता कैकेयी के कृत्य से अत्यंत क्षुब्ध हुए; उन्होंने राजसिंहासन को 'विष-कुंड' कहकर ठुकरा दिया। राम को वन से लौटाने के लिए वे चित्रकूट गए, परंतु राम ने पिता का वचन निभाने हेतु लौटने से मना किया।
तब भरत ने राम की चरण-पादुकाएँ लेकर अयोध्या के सिंहासन पर रखीं और स्वयं नंदिग्राम में तपस्वी के रूप में रहकर राज्य का संचालन किया। राम के वनवास-पूर्ण होने पर उन्होंने प्रभु को राज्य सौंप दिया।
वे रामभक्ति और त्याग के प्रतीक हैं; कैकेयी के अन्याय ने उन्हें और भी विनम्र बनाया।
नाते-रिश्ते
- पिता: दशरथ
- माता: कैकेयी
- पत्नी: मांडवी
- भाई: राम, लक्ष्मण, शत्रुघ्न
प्रसिद्ध कथन
संबंधित
स्रोत: वाल्मीकि रामायण – अयोध्याकाण्ड; रामचरितमानस – अयोध्याकाण्ड