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संपाति

रामायण एवं रामचरितमानस

रामायणगिद्धराज

संपाति गिद्धराज अरुण के पुत्र और जटायु के बड़े भाई थे। कथा है कि युवावस्था में उन्होंने सूर्य के अत्यंत निकट उड़कर जटायु की रक्षा की, जिससे उनके पंख जल गए और वे उड़ने में असमर्थ हो गए।

जब वानर-सेना सीता की खोज में दक्षिण समुद्र-तट तक पहुँची और हताश होकर उपवास करने लगी, तब संपाति ने उन्हें देखा। वानरों की बातें सुनकर उन्होंने बताया कि लंका यहाँ से सौ योजन दूर है और रावण ने सीता को अशोक वाटिका में रखा है।

इस सूचना से वानरों को आगे बढ़ने का साहस मिला। कुछ परंपराओं में कहा गया है कि राम-कथा सुनकर संपाति के पंख फिर उग आए।

नाते-रिश्ते

  • पिता: अरुण
  • भाई: जटायु

प्रसिद्ध कथन

संपाति ने वानरों से कहा — "लंका यहाँ से सौ योजन दूर है; वहाँ अशोक वाटिका में रावण ने सीता को रखा है।" (भावानुवाद)

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जटायुहनुमानलंकाअंगद

स्रोत: वाल्मीकि रामायण – किष्किन्धाकाण्ड