एकलव्य
महाभारत
अन्य नाम: निषादराज, हिरण्यधनुष, एकलव्य
एकलव्य निषादराज हिरण्यधनु के पुत्र थे और शबर-निषाद कुल में जन्मे थे। अस्त्र-विद्या सीखने की प्रबल इच्छा लेकर वे द्रोणाचार्य के पास पहुँचे, परंतु निषाद होने के कारण द्रोण ने उन्हें शिष्य बनाने से इनकार कर दिया।
एकलव्य ने वन में द्रोण की मिट्टी की प्रतिमा बनाई और उसे गुरु मानकर अकेले अभ्यास करके धनुर्विद्या में अद्वितीय निपुणता प्राप्त की। एक बार शिकार के समय द्रोण और अर्जुन ने देखा कि एकलव्य ने बिना दृष्टि-सहायता के केवल शब्द सुनकर बाण चलाया — वह श्वान का मुँह बाणों से भर दिया। यह देखकर अर्जुन को ईर्ष्या हुई और द्रोण ने एकलव्य से गुरु-दक्षिणा माँगी।
एकलव्य ने बिना संकोच अपने दाहिने हाथ का अंगूठा काटकर गुरु-दक्षिणा में दे दिया, जिससे वे धनुर्विद्या में अक्षम हो गए। कुछ परंपराओं में उन्हें महाभारत युद्ध में जरासंध या दुर्योधन के पक्ष से लड़ते हुए कृष्ण द्वारा वध किए जाने का उल्लेख है। एकलव्य गुरुभक्ति, स्वाभिमान और प्रतिभा के साथ हुए अन्याय का प्रतीक हैं।
नाते-रिश्ते
- पिता: हिरण्यधनु (निषादराज)
- गुरु (मान्य): द्रोणाचार्य
- कुल: निषाद
पूर्वजन्म एवं प्रारब्ध
क्रोधवश दैत्यों में से एक का अंश माने जाते हैं।
प्रसिद्ध कथन
संबंधित
स्रोत: महाभारत – आदि पर्व