गोकर्ण
कथाएँ एवं घटनाएँ
तुंगभद्रा नदी के तट पर आत्मदेव नामक ब्राह्मण रहते थे। उनके पुत्र धुंधुकारी ने बहुत अन्याय और पाप किए, जिससे वह मृत्यु के बाद प्रेत बन गया। आत्मदेव और उनकी पत्नी ने संतान के लिए शिव की उपासना की और उन्हें एक पुत्र मिला, जो कौमार्य-व्रत का पालन करने वाला तथा गो-दान आदि में दक्ष हुआ।
यह आख्यान भागवत माहात्म्य (पद्म पुराण के अंतर्गत) में वर्णित है, और कहीं-कहीं इसे स्कन्द पुराण से जोड़ा जाता है। पुत्र का नाम गोकर्ण पड़ा, जो वृद्धावस्था में शिव की आराधना करके घर लौटा और भाई धुंधुकारी की प्रेत-दशा जानकर उसके उद्धार का उपाय सोचने लगा।
एक अभ्यागत की सलाह से गोकर्ण ने धुंधुकारी की अस्थियों को गो-पुच्छ में रखकर सात दिन तक भागवत कथा का श्रवण कराया। सातवें दिन धुंधुकारी की प्रेत-योनि से मुक्ति हुई और वह दिव्य रूप में प्रकट होकर भगवद्धाम को गया। उसी स्थान पर वह तीर्थ 'गोकर्ण' नाम से प्रसिद्ध हुआ, जिसे दक्षिण का काशी कहा जाता है। कथा का महत्व यह है कि भागवत-श्रवण और पुण्य-तीर्थ के प्रभाव से पापी जीव का भी उद्धार होता है।
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स्रोत: भागवत माहात्म्य (पद्म पुराण) – गोकर्ण-माहात्म्य; परंपरा-प्रसिद्ध