द्रौपदी हरण
कथाएँ एवं घटनाएँ
पांडवों के वनवास-काल में सिंधुराज जयद्रथ, जो द्रौपदी पर मोहित हो गया था, एक दिन उसका अपहरण कर ले गया। पांडव उस समय आखेट के लिए गए थे और द्रौपदी आश्रम में अकेली थी।
यह प्रसंग महाभारत के वन पर्व में वर्णित है। जयद्रथ द्रौपदी को अपने रथ पर बैठाकर तेजी से भागा, किंतु रास्ते में द्रौपदी के विरोध और सहायता-पुकार ने उसके पाप को और बढ़ा दिया।
मुख्य पात्र द्रौपदी, जयद्रथ और पांडव हैं। जब धर्मराज युधिष्ठिर और भीम को घटना का पता चला, तो भीम ने शीघ्र जयद्रथ को जा पकड़ा और उसे बंदी बनाकर लाया। युधिष्ठिर ने उसे क्षमा करते हुए उसका सिर मुँड़ाकर और उसकी सेना को दास बनाकर छोड़ दिया; यह अपमान जयद्रथ के मन में महाभारत-युद्ध का बैर बन गया। कथा का महत्व यह है कि पर-स्त्री पर दृष्टि रखने वाले का पतन होता है और धर्म की रक्षा के लिए पांडव सदा तत्पर रहे।
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स्रोत: महाभारत – वन पर्व