कुबेर-पुत्रों का उद्धार
कथाएँ एवं घटनाएँ
धनपति कुबेर के पुत्र नलकूबर और मणिग्रीव अपने पिता के धन तथा शिव-सेवा से प्राप्त वैभव के मद में चूर होकर उद्दंड हो गए थे। एक दिन वे मदिरा पीकर स्त्रियों के साथ गंगा में नग्न अवस्था में विहार कर रहे थे, तभी देवर्षि नारद वहाँ से निकले।
यह कथा श्रीमद्भागवत पुराण के दशम स्कन्ध में वर्णित है। स्त्रियों ने तो वस्त्र सँभाल लिए, किंतु दोनों भाइयों ने मद के कारण ऋषि को पहचाना तक नहीं और उनका आदर नहीं किया।
नारद ने उन्हें वृक्ष हो जाने का शाप दिया, पर साथ ही कहा कि श्रीकृष्ण के स्पर्श से उन्हें मुक्ति मिलेगी। वे वृंदावन में यमलार्जुन के दो वृक्ष बनकर खड़े हुए, और कालांतर में श्रीकृष्ण के स्पर्श से उनका उद्धार हुआ। कथा का महत्व यह है कि धन-मद से विवेक नष्ट होता है, पर भगवान की कृपा से पतित जीव का भी उद्धार होता है।
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स्रोत: श्रीमद्भागवत पुराण – दशम स्कन्ध