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दक्ष यज्ञ

कथाएँ एवं घटनाएँ

अन्य नाम: दक्ष का यज्ञ, सती का देह त्याग, वीरभद्र

चतुर्थ स्कन्धदक्षसतीवीरभद्र

प्रजापति दक्ष ने एक विशाल यज्ञ का आयोजन किया, परंतु शिव को आमंत्रित नहीं किया। अपने पिता का यह व्यवहार सहन न कर सकीं सती (शिव की पत्नी) बिना निमंत्रण के यज्ञ में पहुँचीं।

यज्ञ-स्थल पर दक्ष ने सबके सामने शिव का घोर अपमान किया। पिता का अपमान और शिव-निंदा सुनकर सती अत्यंत दुखी हुईं और उन्होंने योगाग्नि से अपने शरीर का त्याग कर दिया।

सती के देह त्याग का समाचार पाकर शिव अत्यंत क्रुद्ध हुए। उन्होंने अपनी जटा से वीरभद्र को उत्पन्न किया, जिसने यज्ञ-स्थल पर पहुँचकर दक्ष का सिर काट दिया और यज्ञ नष्ट कर दिया।

बाद में ब्रह्मा आदि देवताओं के अनुनय पर शिव प्रसन्न हुए और दक्ष को बकरे का सिर लगाकर पुनर्जीवित किया गया तथा यज्ञ पूर्ण हुआ। सती की देह जहाँ-जहाँ गिरी, वे स्थान शक्तिपीठ कहलाए। यह प्रसंग शिव की महिमा और शक्ति-उपासना की उत्पत्ति से जुड़ा है।

प्रसिद्ध कथन

सती ने कहा — 'हे पिता, आपने शिव का अपमान किया; मैं यह शरीर त्याग दूँगी।' (भावानुवाद)

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स्रोत: श्रीमद्भागवत पुराण – चतुर्थ स्कन्ध