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ययाति

वेद एवं पुराण

अन्य नाम: ययाति, चंद्रवंशी राजा, नहुष-पुत्र, पुरु-पिता

राजाचंद्रवंशकथामहाभारत

ययाति चंद्रवंशी राजाओं में प्रमुख हैं — चंद्र के वंश में नहुष के पुत्र तथा महाभारत में कौरव-पांडवों के पूर्वज पुरु के पिता। उनकी कथा इच्छा, भोग और वैराग्य के विषय में प्रसिद्ध उपदेश देती है। उनका विवाह शुक्राचार्य की पुत्री देवयानी तथा दैत्य-राज की पुत्री शर्मिष्ठा से हुआ।

प्रसिद्ध प्रसंग — शर्मिष्ठा को छल से देवयानी की सखी बनाकर महल में लाने के कारण क्रुद्ध शुक्राचार्य ने ययाति को श्राप दिया कि वे समय से पूर्व वृद्ध हो जाएँगे। ययाति ने युवावस्था की इच्छा जताई, तब शुक्र ने कहा कि यदि कोई अपनी युवावस्था उन्हें दे दे तो वे भोग सकते हैं। ययाति ने अपने पाँच पुत्रों (यदु, तुर्वसु, द्रुह्यु, अनु, पुरु) से युवावस्था माँगी; केवल पुरु ने दे दी।

हज़ार वर्ष भोगने के बाद भी ययाति की तृष्णा नहीं बुझी। तब उन्होंने पुरु से अपनी वृद्धावस्था वापस ली, पुरु को युवावस्था और राज्य सौंपा, और स्वयं वन में तपस्या करने चले गए। यदु (यदुवंश/कृष्ण के पूर्वज) आदि शेष पुत्रों को ययाति ने दूर किया।

ययाति की कथा महाभारत (आदिपर्व), विष्णु पुराण तथा श्रीमद्भागवत पुराण में विस्तृत है।

नाते-रिश्ते

  • पिता: नहुष
  • पत्नी: देवयानी, शर्मिष्ठा
  • पुत्र: पुरु, यदु

प्रसिद्ध कथन

महाभारत में ययाति कहते हैं — "न जातु कामः कामानामुपभोगेन शाम्यति। हविषा कृष्णवर्त्मेव भूय एवाभिवर्धते॥" अर्थात् भोगों से काम कभी शांत नहीं होता; घी डालने पर अग्नि की भाँति वह और बढ़ता है।
ययाति ने पुत्रों से युवावस्था माँगी; केवल पुरु ने अपनी युवावस्था पिता को अर्पित की। (भावानुवाद)
मंत्र — "ॐ ययातये नमः।"

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चंद्रशुक्रमनुबृहस्पतिकुरुक्षेत्र

स्रोत: महाभारत (आदिपर्व); विष्णु पुराण; श्रीमद्भागवत पुराण