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बृहदारण्यक उपनिषद

ग्रंथ

अन्य नाम: बृहदारण्यक, बृहदारण्यकोपनिषद्

रचयिता / कर्ता: अपौरुषेय

उपनिषदवेदांतअद्वैतशुक्ल यजुर्वेद

बृहदारण्यक उपनिषद शुक्ल यजुर्वेद (शतपथ ब्राह्मण के आरण्यक भाग) से संबंधित है। यह उपनिषदों में सबसे बड़ा और वेदांत का अत्यंत प्रमुख ग्रंथ माना जाता है।

इसके मुख्य पात्र महर्षि याज्ञवल्क्य हैं, जो अपनी पत्नी मैत्रेयी को आत्मज्ञान का उपदेश देते हैं। 'अहं ब्रह्मास्मि', 'नेति नेति' और 'आत्मा वा अरे द्रष्टव्यः' जैसे महावाक्य यहीं मिलते हैं।

इसमें 6 अध्याय हैं और ब्रह्म, आत्मा, जगत् के मूल कारण तथा मोक्ष पर गहन विवेचन है। इसमें अनेक रूपक और संवाद संकलित हैं।

यह श्रुति का भाग होने से अपौरुषेय माना जाता है। अद्वैत वेदांत के आचार्य इस उपनिषद को प्रमुख प्रमाण-ग्रंथ मानते हैं।

प्रसिद्ध कथन

अहं ब्रह्मास्मि (बृहदारण्यक उपनिषद 1.4.10) — भाव: 'मैं ब्रह्म हूँ।'

संबंधित

यजुर्वेदशतपथ ब्राह्मणउपनिषदआत्माब्रह्मवेदांत

स्रोत: बृहदारण्यक उपनिषद (शुक्ल यजुर्वेद, शतपथ ब्राह्मण)