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छांदोग्य उपनिषद

ग्रंथ

अन्य नाम: छान्दोग्य उपनिषद, छांदोग्य

रचयिता / कर्ता: अपौरुषेय

उपनिषदवेदांतब्रह्मविद्यासामवेद

छांदोग्य उपनिषद सामवेद की छंदोग शाखा से संबंधित प्रमुख उपनिषद है। यह वैदिक उपनिषदों में बृहदारण्यक के बाद सबसे बड़ा और अत्यंत महत्वपूर्ण माना जाता है।

इसमें 8 अध्याय और अनेक खंड हैं। इसका विषय ब्रह्म, आत्मा, जगत् की उत्पत्ति, उपासना और मोक्ष है।

इसमें सत्यकाम जाबाल, उद्दालक आरुणि और श्वेतकेतु, तथा नारद-सनत्कुमार संवाद प्रसिद्ध हैं, साथ ही 'तत्त्वमसि' (वह तुम हो) जैसे महावाक्य मिलते हैं।

यह श्रुति का भाग होने से अपौरुषेय है और परंपरा इसे अनेक ऋषि-आचार्यों की शिक्षाओं का संकलन मानती है। वेदांत दर्शन का यह आधार-ग्रंथ है।

प्रसिद्ध कथन

स य एषोऽणिमैतदात्म्यमिदं सर्वं तत्सत्यं स आत्मा तत्त्वमसि श्वेतकेतो॥ (छांदोग्य उपनिषद 6.8.7) — भाव: 'वह सूक्ष्म आत्मा ही यह सब है; वह सत्य है; वह तुम हो, हे श्वेतकेतु।'

संबंधित

सामवेदउपनिषदआत्माब्रह्मवेदांत

स्रोत: छांदोग्य उपनिषद (सामवेद छंदोग शाखा)