तैत्तिरीय उपनिषद
ग्रंथ
अन्य नाम: तैत्तिरीय, तैत्तिरीयोपनिषद्
रचयिता / कर्ता: अपौरुषेय
तैत्तिरीय उपनिषद कृष्ण यजुर्वेद की तैत्तिरीय शाखा से संबंधित है। यह तैत्तिरीय आरण्यक का भाग है और अपने सुंदर शांति-मंत्रों तथा ब्रह्मविद्या के लिए प्रसिद्ध है।
यह तीन वल्लियों में विभाजित है — शिक्षावल्ली, ब्रह्मानन्दवल्ली और भृगुवल्ली। शिक्षावल्ली में वर्णोच्चारण और शिक्षा के नियम हैं, तथा अन्य दो वल्लियों में ब्रह्म और आनंद का विवेचन है।
इसमें 'सत्यं ज्ञानमनन्तं ब्रह्म' और 'आनन्दो ब्रह्म' जैसे प्रसिद्ध वाक्य हैं, साथ ही भृगु को पिता वरुण द्वारा दिया गया क्रमिक ब्रह्मोपदेश भी।
यह श्रुति का भाग होने से अपौरुषेय है। इसके शांति-मंत्र 'सह नाववतु' आदि भारतीय शिक्षा-परंपरा में अत्यंत प्रचलित हैं।
प्रसिद्ध कथन
सत्यं ज्ञानमनन्तं ब्रह्म (तैत्तिरीय उपनिषद 2.1.1) — भाव: 'ब्रह्म सत्य, ज्ञान और अनंत है।'
सह नाववतु। सह नौ भुनक्तु। सह वीर्यं करवावहै॥ (तैत्तिरीय उपनिषद, शांति पाठ)
संबंधित
स्रोत: तैत्तिरीय उपनिषद (कृष्ण यजुर्वेद, तैत्तिरीय आरण्यक)