अरण्यकांड
ग्रंथ
अन्य नाम: अरण्य कांड, वनकांड
रचयिता / कर्ता: वाल्मीकि
अरण्यकांड वाल्मीकि रामायण का तीसरा कांड है। इसमें श्रीराम, सीता और लक्ष्मण के दंडकारण्य-प्रवास, विराध-वध, शरभंग, सुतीक्ष्ण तथा अगस्त्य मुनि के दर्शन और पंचवटी में निवास का वर्णन है।
मुख्य घटनाएँ — शूर्पणखा का प्रसंग, उसके द्वारा राम पर मोहित होने का प्रयास, लक्ष्मण द्वारा उसका नाक-कान काटना, और फिर खर-दूषण-त्रिशिरा का वध। इससे लंका में रावण की प्रतिक्रिया होती है।
इसी कांड में रावण की मारीच से सहायता, स्वर्ण-मृग के रूप में माया, सीता-हरण, जटायु का वध तथा श्रीराम की सीता-वियोग में व्याकुलता और सहायता की खोज वर्णित है।
महात्मा: यह कांड रामकथा में संकट और वियोग का आरंभ है तथा श्रीराम के धर्म-निष्ठ और मर्यादित स्वरूप को प्रकट करता है।
प्रसिद्ध कथन
रामो विग्रहवान्धर्मः साधुः सत्यपराक्रमः। राजा सर्वस्य लोकस्य देवानामिव वासवः॥ (मारीच-वचन, अरण्यकांड)
संबंधित
स्रोत: वाल्मीकि रामायण, अरण्यकांड