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अमृत

कथाएँ एवं घटनाएँ

अन्य नाम: सुधा, अमृत-कलश, मोहिनी, अमरत्व

समुद्र मंथनमोहिनीराहु-केतुअमरत्व

देवताओं और असुरों ने अमृत की प्राप्ति हेतु मिलकर क्षीरसागर का मंथन किया। अंत में धन्वंतरि अमृत-कलश लेकर प्रकट हुए। अमृत को देखकर असुरों ने बलपूर्वक उसे छीन लिया और यह विवाद करने लगे कि पहले कौन पिएगा। तब भगवान विष्णु ने मोहिनी का रूप धारण किया।

यह कथा श्रीमद्भागवत पुराण के अष्टम स्कन्ध, महाभारत के आदि पर्व तथा विष्णु पुराण में विस्तार से वर्णित है। मोहिनी के रूप पर मुग्ध असुरों ने अमृत-वितरण का भार उन्हीं को सौंप दिया।

मुख्य पात्र विष्णु (मोहिनी), धन्वंतरि, देवता, असुर और स्वर्भानु (राहु) हैं। मोहिनी ने देवताओं को अमृत पिलाया; स्वर्भानु असुर ने देवता का रूप धरकर चुपके से अमृत पी लिया, पर सूर्य-चंद्रमा ने पहचान कर बता दिया। अमृत कंठ तक पहुँच चुका था, अतः सुदर्शन चक्र से सिर कटने पर भी वह अमर रहा—सिर राहु और धड़ केतु बने। इस कथा का महत्व यह है कि अमृत अमरत्व का प्रतीक है और देवताओं की विजय तथा राहु-केतु के ग्रहण का रहस्य इसी से जुड़ा है।

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स्रोत: श्रीमद्भागवत पुराण – अष्टम स्कन्ध; विष्णु पुराण