अभिनवगुप्त गीतार्थसंग्रह
ग्रंथ
अन्य नाम: गीतार्थसंग्रह, गीतार्थ संग्रह
रचयिता / कर्ता: अभिनवगुप्त
यह भगवद्गीता पर अभिनवगुप्त द्वारा रचित भाष्य है, जिसे गीतार्थसंग्रह कहा जाता है। अभिनवगुप्त ने गीता के काश्मीर पाठ पर यह टीका लिखी, जो सामान्य पाठ से कहीं-कहीं भिन्न है।
अभिनवगुप्त कश्मीर के प्रसिद्ध शैव आचार्य, कवि और काव्यशास्त्री थे, तथा त्रिक (काश्मीर शैव) दर्शन के प्रमुख प्रतिपादक हैं।
इस भाष्य में गीता का गूढ़ अर्थ शैव दृष्टि से खोला गया है — भोग और समाधि के क्रमिक अभ्यास से करणों की शुद्धि और परम चेतना में विश्रान्ति। यह काश्मीर शैव परंपरा का गीता-भाष्य है और तांत्रिक-आध्यात्मिक व्याख्या का अनुपम उदाहरण है।
प्रसिद्ध कथन
(भावानुवाद) भोग और समाधि के क्रमिक अभ्यास द्वारा करणों की शुद्धि होती है और साधक परम शिव में विश्रान्ति पाता है।
संबंधित
भगवद्गीतामहाभारत (ग्रंथ)काश्मीर गीता-भाष्यशांकर भाष्य (भगवद्गीता)
स्रोत: गीतार्थसंग्रह