काश्मीर गीता-भाष्य
ग्रंथ
अन्य नाम: सर्वतोभद्र, काश्मीरीय गीता भाष्य
रचयिता / कर्ता: राजानक रामकण्ठ
यह कश्मीर की परंपरा में भगवद्गीता पर लिखे गए भाष्यों का प्रतिनिधि ग्रंथ है, जो गीता के काश्मीर पाठ (काश्मीर संस्करण) पर आधारित है। इस परंपरा में राजानक रामकण्ठ का सर्वतोभद्र प्राचीनतम भाष्य माना जाता है।
कश्मीर के भाष्यकार प्रायः शैव (त्रिक/प्रत्यभिज्ञा) दर्शन से जुड़े थे। रामकण्ठ, अभिनवगुप्त आदि आचार्यों ने गीता की व्याख्या शैव दृष्टि से की।
इस भाष्य-परंपरा की विशेषता यह है कि यह गीता के काश्मीर पाठ पर टिकी है, जो सामान्य पाठ से कहीं-कहीं भिन्न है। इसमें ज्ञान, कर्म और भक्ति के समन्वय तथा परम चेतना की प्राप्ति पर बल दिया गया है।
प्रसिद्ध कथन
धर्मक्षेत्रे कुरुक्षेत्रे सर्वक्षत्रसमागमे। मामकाः पाण्डवाश्चैव किमकुर्वत संजय॥ (काश्मीर पाठ, गीता १.१)
(भावानुवाद) गीता का रहस्य ज्ञान, कर्म और भक्ति के समन्वय में है, और मोक्ष परम चेतना की पहचान में है।
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स्रोत: काश्मीर गीता-भाष्य