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यजुर्वेद संहिता

ग्रंथ

अन्य नाम: यजुर्वेद, कर्मवेद, यजुः संहिता

रचयिता / कर्ता: अपौरुषेय

वेदसंहितायज्ञकर्मकांडश्रुति

यजुर्वेद संहिता उस वेद को कहा जाता है जिसमें यज्ञ करने की विधियाँ और उनमें प्रयुक्त 'यजुः' नामक गद्य-पद्य मंत्र संकलित हैं। यह वेद मुख्यतः कर्मकांड और यज्ञ-अनुष्ठान का वेद है, इसलिए इसे 'कर्मवेद' भी कहते हैं।

यजुर्वेद की दो प्रमुख शाखाएँ हैं — शुक्ल यजुर्वेद और कृष्ण यजुर्वेद। शुक्ल यजुर्वेद में मंत्र और विधियाँ पृथक् क्रम में हैं (वाजसनेयी संहिता), जबकि कृष्ण यजुर्वेद (तैत्तिरीय, मैत्रायणी, कठ) में मंत्र और ब्राह्मण-गद्य मिश्रित रूप में मिलते हैं।

परंपरा के अनुसार यह भी अपौरुषेय है। कृष्ण यजुर्वेद का संबंध महर्षि वैशंपायन और उनके शिष्य याज्ञवल्क्य से जोड़ा जाता है, जिनसे शुक्ल यजुर्वेद की परंपरा आगे बढ़ी।

इसमें यज्ञ, हवन, बलि और विभिन्न संस्कारों के मंत्र तथा विधान हैं। शतपथ ब्राह्मण और बृहदारण्यक उपनिषद शुक्ल यजुर्वेद से जुड़े प्रमुख ग्रंथ हैं।

प्रसिद्ध कथन

इषे त्वोर्जे त्वा वायवः स्थ (शुक्ल यजुर्वेद, वाजसनेयी संहिता 1.1) — भाव: 'अन्न और ऊर्जा के लिए तुम्हें आहूत करते हैं।' (भावानुवाद)

संबंधित

यजुर्वेदचार वेदयज्ञशतपथ ब्राह्मणकल्प (वेदांग)

स्रोत: शुक्ल यजुर्वेद (वाजसनेयी संहिता) एवं कृष्ण यजुर्वेद (तैत्तिरीय संहिता)