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सामवेद संहिता

ग्रंथ

अन्य नाम: सामवेद, गानवेद, साम संहिता

रचयिता / कर्ता: अपौरुषेय

वेदसंहितागानसंगीतश्रुति

सामवेद संहिता उस वेद को कहा जाता है जिसके मंत्र यज्ञ में गाए जाते हैं। 'साम' का अर्थ है गान अथवा संगीत, और सामवेद मुख्यतः ऋग्वेद के मंत्रों को गाने योग्य स्वरों में व्यवस्थित करता है।

इसमें लगभग 1875 मंत्र हैं, जिनमें अधिकांश ऋग्वेद से लिए गए हैं और शेष सामवेद की अपनी परंपरा से। इसे पूर्वार्चिक, उत्तरार्चिक और महानाम्न्यार्चिक नामक भागों में बाँटा जाता है।

यह अपौरुषेय वेद है और इसकी अनेक शाखाएँ थीं, जिनमें कौथुम तथा जैमिनीय शाखाएँ प्रमुख मानी जाती हैं। यज्ञ में 'उद्गाता' ऋत्विक इसी वेद के मंत्र गाता था।

सामवेद भारतीय संगीत-परंपरा का आदि स्रोत माना जाता है। छांदोग्य उपनिषद और केन उपनिषद इससे जुड़े प्रमुख ग्रंथ हैं।

प्रसिद्ध कथन

अग्न आ याहि वीतये गृणानो हव्यदातये। निहोता सत्सि बर्हिषि॥ (सामवेद; मूल ऋग्वेद 6.16.10)

संबंधित

सामवेदचार वेदमंत्रछांदोग्य उपनिषदकेन उपनिषद

स्रोत: सामवेद संहिता (कौथुम एवं जैमिनीय शाखा)