ऋग्वेद संहिता
ग्रंथ
अन्य नाम: ऋग्वेद, ऋक्संहिता, ऋचां संहिता
रचयिता / कर्ता: अपौरुषेय
ऋग्वेद संहिता वेदों में सबसे प्राचीन और सबसे बड़ी संहिता है। इसमें मुख्य रूप से देवताओं की स्तुति के मंत्र (ऋचाएँ) संकलित हैं, जिन्हें अग्नि, इंद्र, वरुण, सूर्य, उषा आदि देवताओं को समर्पित किया गया है। 'ऋच' शब्द का अर्थ है स्तुति का पद्य, और इन्हीं ऋचाओं के संग्रह को ऋग्वेद कहा जाता है।
यह ग्रंथ दस मंडलों में विभाजित है और इसमें कुल 1028 सूक्त तथा लगभग 10,600 मंत्र हैं। परंपरा के अनुसार ऋग्वेद अपौरुषेय है, अर्थात् इसकी रचना किसी मनुष्य ने नहीं की; ऋषियों को यह ज्ञान तपस्या और समाधि में 'दृष्ट' हुआ। इसलिए इसे 'ऋषि-दृष्ट' अथवा 'श्रुति' कहा जाता है।
इसकी विषय-वस्तु में देवस्तुति, यज्ञ की प्रार्थनाएँ, सृष्टि के आदि-सूक्त (नासदीय सूक्त), पुरुष-सूक्त तथा ऐतिहासिक-सामाजिक संकेत मिलते हैं। यह वैदिक देवताओं, यज्ञ-पद्धति और प्रारंभिक भारतीय संस्कृति का प्रमुख स्रोत है।
सायणाचार्य का भाष्य इसका सबसे प्रसिद्ध व्याख्या-ग्रंथ है। ऋग्वेद समस्त वैदिक परंपरा का आधार माना जाता है और इसमें गायत्री मंत्र जैसे अत्यंत पवित्र मंत्र भी मिलते हैं।
प्रसिद्ध कथन
संबंधित
स्रोत: ऋग्वेद संहिता (सायण भाष्य सहित)