अग्नि
वेद एवं पुराण
अन्य नाम: हुताशन, पावक, वैश्वानर, ज्वलन, अनल
अग्नि अग्नि-तत्त्व के देवता और यज्ञ के मुख्य अधिष्ठाता हैं। वे देवताओं के 'मुख' हैं — आहुति अग्नि के माध्यम से ही देवताओं तक पहुँचती है, इसीलिए प्रत्येक यज्ञ में उनका स्थान सर्वोपरि है। ऋग्वेद का प्रथम मंत्र ही अग्नि को समर्पित है, जिसमें उन्हें 'होता' (आह्वानकर्ता) और 'ऋत्विज्' (यज्ञ-पुरोहित) कहा गया।
उनका स्वरूप ज्वालामय है और वाहन मेष (भेड़)। माना जाता है कि अग्नि की सात जिह्वाएँ हैं, जिनके नाम परंपरा में गिनाए जाते हैं। वे दिक्पालों में दक्षिण-पूर्व दिशा के रक्षक हैं। 'वैश्वानर' रूप में वे सब प्राणियों के भीतर पाचन-अग्नि के रूप में वास करते हैं।
अग्नि से जुड़े प्रसंगों में — अग्निकुंड से द्रौपदी का प्रकट होना, सीता की अग्नि-परीक्षा, और अग्नि द्वारा देवताओं के संदेशवाहक बनना प्रमुख हैं। अग्नि को 'हव्यवाहन' (आहुति ढोने वाला) कहा जाता है। वे भृगु या अंगिरा ऋषि के वंश में उत्पन्न माने जाते हैं और कई बार उनका मानव-रूप भी वर्णित है।
अग्नि की महिमा ऋग्वेद के प्रथम मंडल में सर्वाधिक विस्तृत है; विष्णु पुराण और महाभारत में भी उनकी अनेक कथाएँ आती हैं।
नाते-रिश्ते
- पिता: अंगिरा (या भृगु)
- वाहन: मेष
प्रसिद्ध कथन
संबंधित
स्रोत: ऋग्वेद (प्रथम मंडल); विष्णु पुराण; महाभारत