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विदुर नीति

कथाएँ एवं घटनाएँ

अन्य नाम: विदुर नीति, प्रजागर पर्व

विदुरनीतिराजधर्म

संजय के पांडवों से लौटने पर धृतराष्ट्र के मन में युद्ध की आशंका से अत्यंत चिंता उत्पन्न हुई। वे रात्रि में नींद नहीं सो सके और विदुर को बुलाकर उनसे कल्याणकारी परामर्श माँगा।

विदुर ने धृतराष्ट्र को राजनीति, धर्म, न्याय, सदाचार, वाणी-संयम, मित्रता, समृद्धि और विवेक पर अनेक नीति-वचन कहे। इनमें सत्य, अहिंसा, दान, क्षमा और आत्म-संयम का महत्व बताया गया।

विदुर ने स्पष्ट कहा कि दुर्योधन के अपराध और धृतराष्ट्र के पुत्र-मोह से कुल का विनाश होगा। उन्होंने युधिष्ठिर को राजा बनाने की सलाह दी और कर्ण तथा शकुनि से दूरी रखने को कहा।

यह उपदेश 'विदुर नीति' के नाम से प्रसिद्ध हुआ और महाभारत के उद्योग पर्व के प्रजागर पर्व (अध्याय 33 से 44 तक) में संकलित है। धृतराष्ट्र विदुर की बातें मान न सके और अंत में उनकी चेतावनी सत्य हुई।

प्रसिद्ध कथन

'सुलभाः पुरुषा राजन् सततं प्रियवादिनः। अप्रियस्य च पथ्यस्य वक्ता श्रोता च दुर्लभः॥' (विदुर नीति)
'सुखार्थिनः कुतो विद्या नास्ति विद्यार्थिनः सुखम्। सुखार्थी वा त्यजेद्विद्यां विद्यार्थी वा त्यजेत्सुखम्॥' (विदुर नीति)

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स्रोत: महाभारत – उद्योग पर्व