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उपनयन संस्कार

संस्कार एवं श्राद्ध-विधि

अन्य नाम: उपनयन, जनेऊ, व्रतबंध, मुंज, यज्ञोपवीत संस्कार

संस्कारगृह्यसूत्रगायत्री मंत्रद्विज

उपनयन का अर्थ है गुरु के निकट ले जाना। इस संस्कार में बालक को यज्ञोपवीत धारण कराकर गायत्री मंत्र की दीक्षा दी जाती है और वह द्विज कहलाता है।

यह ब्राह्मण के लिए आठवें, क्षत्रिय के लिए ग्यारहवें और वैश्य के लिए बारहवें वर्ष में किया जाता है। विधि में मुंडन, हवन, यज्ञोपवीत धारण, मेखला और दंड धारण, गायत्री उपदेश तथा भिक्षाचर्या के अंग होते हैं।

इसकी विधि आश्वलायन, आपस्तम्ब और गोभिल आदि गृह्यसूत्रों तथा मनुस्मृति में वर्णित है। इसका महत्व द्विजत्व, विद्या-दीक्षा और ब्रह्मचर्य-आश्रम में प्रवेश से जुड़ा है।

प्रसिद्ध कथन

ॐ यज्ञोपवीतं परमं पवित्रं प्रजापतेर्यत्सहजं पुरस्तात्। आयुष्यमग्र्यं प्रतिमुञ्च शुभ्रं यज्ञोपवीतं बलमस्तु तेजः॥

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स्रोत: गृह्यसूत्र